औसत क्यों काम करता है: प्रसरण का गणित

उस गणित से बने क्लासिक मॉडल जो आप पहले से जानते हैं

एक ही कमरे में दस थर्मामीटर टँगे हैं, हर एक सच्चा तापमान और साथ में अपनी छोटी-सी काँप-थरथराहट दिखाता है: बनावट की कोई खासियत, हवा का कोई झोंका, डिग्री का ऐसा अंश-भर शोर जिसे कोई नहीं हटा सकता। इनमें से केवल एक को पढ़िए और वह थरथराहट आपके उत्तर से चिपकी रह जाती है। दसों का औसत लीजिए, और कुछ सुखद घटता है। अलग-अलग खासियतें आपस में कटने लगती हैं, क्योंकि किसी थर्मामीटर का ऊँचा पढ़ना उतना ही संभावित है जितना किसी दूसरे का नीचा पढ़ना। औसत पाठ्यांक सच्चे तापमान के उससे कहीं करीब ठहरता है जहाँ अकेला कोई भी थर्मामीटर पहुँच पाता है।

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